अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) क्या होती है

अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) से सम्बंधित जानकारी

दुनिया में ऐसे बहुत से लोग जो बहुत अपराध करते है और उन्हें उनके द्वारा किये जाने वाले अपराधों की सजा भी दी जाती है, उन्हें सजा से दण्डित करने के लिए पुलिस के द्वारा गिरफ़्तार किया जाता है और फिर कोर्ट उन्हें उनके अपराध के मुताबिक़, सजा सुनाती है, लेकिन कई बार ऐसा भी हो जाता है, लोग अपराध न करने के बावजूद भी किसी झूठे केस में फँस जाते है और उन्हें बिना किसी अपराध के गिरफ़्तार कर लिया जाता है | इसलिए ऐसे बेगुनाह लोगों के लिए एक अग्रिम जमानत बनाई गई है | जिन लोगों को पहले से ही अपनी गिरफ़्तारी की शंका होती है, तो वो लोग गिफ्त्तर होने से पहले ही कोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत ले सकते है और अपने अपराध से बाहर निकल सकते है, क्योंकि, अग्रिम जमानत का अर्थ ही होता है कि, पुलिस की गिफ्त्तरी से पहले ही ले कोर्ट द्वारा अपराधी को बेल मिल जाना|

जिस व्यक्ति को कोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत प्रदान कर दी जाती है तो उस व्यक्ति को पुलिस गिरफ़्तार नहीं करती है, क्योंकि यह कोर्ट का आदेश होता है, कि अग्रिम जमानत प्राप्त व्यक्ति को गिरफ़्तार न किया जाये | इसलिए यदि आप भी अग्रिम जमानत के विषय में जानना चाहते है, तो यहाँ पर आपको अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) क्या होती है | इसकी विस्तृत जानकारी प्रदान की जा रही है | 

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अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) क्या होती है

अग्रिम जमानत भी सभी जमानतों की तरह ही होती है, लेकिन इस जमानत को कोर्ट व्यक्ति के गिरफ़्तार होने से पहले ही देता है और सभी जमानत व्यक्ति को गिरफ़्तार होने के बाद दी जाती है | इस अग्रिम जमानत का मतलब होता है कि,   गिरफ्तार होने से पहले कोर्ट द्वारा व्यक्ति रिहाई प्रदान कर देना |  अग्रिम जमानत प्राप्त करने वाले व्यक्ति को कोई भी क़ानून अपनी हिरासत में नहीं ले  सकता है | यह जमानत एक अस्थायी स्वतंत्रता है | आरोपों की गंभीरता को देखते हुए और उसमें सच्चाई का पता लगाने के बाद न्यायाधीश जमानत या अग्रिम जमानत व्यक्ति को प्रदान  कर देते है | यह एक ऐसी जमानत होती है, जिसमें जब तक व्यक्ति का  अपराध पूरी तरह से सिद्ध नहीं हो जाता है तब तक वह व्यक्ति यह जमानत प्राप्त करके रिहा रह सकता है|

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अग्रिम जमानत के नियम (RULE)

भारतीय दंड संहिता की धारा-438 के तहत अग्रिम जमानत  दिए जाने के लिए तय किया गया है | इस धारा में केवल उन्ही व्यक्तियों को शामिल किया जाता है, जो पूर्ण रूप से उस अपराध के हिस्सा नहीं जिसमें उन्हें फंसाया जा रहा है | इसलिए वो गिरफ़्तार होने से पहले ही कोर्ट  आवेदन करके अग्रिम जमानत ले सकते है | इसके बाद उस व्यक्ति को बात की सच्चाई तक पहुंचकर न्यायाधीश पर्सनल बॉन्ड के साथ जमानती पेश करने के लिए आदेश प्रदान कर देते है | इसके अलावा व्यक्ति को 10 हजार रुपये की जमानती पेश करने का आदेश दिया जाता है, जिसे व्यक्ति कोर्ट में जमा करनी होती है  |

यदि किसी व्यक्ति को किसी अपराध में फंसने की शंका होती हैं, तो वह व्यक्ति एफआईआर होने से पहले  अग्रिम जमानत के लिए आवेदन  करके अपने आपको जेल जाने से बचा सकता है, क्योंकि जमानत मिल जाने के बाद उस व्यक्ति को कोर्ट पुलिस को यह आदेश करती है, “यदि कोई एफआईआर अमुख व्यक्ति के खिलाफ दर्ज होती है तो एफआईआर दर्ज होने के बाद उस व्यक्ति को सात दिन या जब तक कोर्ट के कहे दिन के पहले उस व्यक्ति को सूचित करना होगा और एफआईआर की कॉपी देनी होगी |

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 अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कब किया जा सकता है?

  1. पुलिस के द्वारा गिरफ़्तारी की शंका होने पर वह अपराधी व्यक्ति अपने आपको बचाने के लिए गिरफ़्तारी के पहले ही अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है और यदि उसे कोर्ट की तरफ से अग्रिम जमानत मिल जाती  है, तो  वह व्यक्ति गिरफ़्तार होने से बच सकता है |
  2. इसके साथ ही कुछ लोग रंजिश में फंसाकर अपराधी कहे जाने लगते है, तो उस समयव्यक्ति अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है  और अपने सुरक्षित बचा सकता है |

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