अगर वकील कागज़ न दे तो क्लाइंट को क्या करना चाहिए

वकालत एक पेशा है, यह कोई व्यवसाय नहीं और इस पेशे का मकसद, लोगों की सेवा करना है । एक पेशे की महत्त्व को समझाते हुए, रोस्को पाउंड ने कहा था: “ऐतिहासिक तौर पर, पेशे में 3 विचार शामिल हैं: संगठन (Organisation), सीखने और समाज सेवा की भावना । ये अनिवार्य हैं । इसके अतिरिक्त, रोटी रोजी प्राप्त करने का विचार, इसके साथ है (पर अधिक महत्वपूर्ण नहीं) ।”

अगर वकील कागज़ न दे तो क्लाइंट को क्या करना चाहिए

हमारे यहाँ कानूनी पेशा करने वाले लोगों पर, समाज में क़ानूनी व्यवस्था को बरकरार रखने की एक बड़ी भूमिका होती है । शासन के अनुचित उपयोग के विरुद्ध निजी अधिकारों की सुरक्षा करते हुए एक अधिवक्ता को न्याय, निष्पक्षता, इक्विटी के सिद्धांतों का ध्यान रखना आवश्यक है । जैसा कि हम जानते हैं, एक वकील – मुवक्किल का संबंध, एक विश्वास का संबंध माना जाता है और इस तरह  एक अधिवक्ता  का, अपने क्लाइंट के प्रति नैतिक कर्त्तव्य होता है । एक अधिवक्ता एवं क्लाइंट के मध्य (विवाद के रूप में), गोपनीयता, हितों के भिड़ंत, फीस / शुल्क, महवपूर्ण कागजातों एवं केस की देखरेख आदि सम्बंधित मामले उत्पन्न हो सकते हैं ।

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आखिर उस समय क्या होता है जब एक अधिवक्ता एवं उसके क्लाइंट के बीच फीस को लेकर तकरार हो जाता है, ऐसे केसों में क्लाइंट और अधिवक्ता, एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करते हैं । परिणाम, अधिवक्ता उस केस को तब तक बंद रखता है, जब तक कि उसे अपनी शुल्क/ फीस नहीं प्राप्त होती है, जबकि क्लाइंट, दूसरे अधिवक्ता को रखना चाहता है या उसे शुल्क / फीस नहीं देना चाहता है । इस लेख में हम ऐसी ही समस्या के बारे में बतायेगें ।

गिरफ्तारी के बाद जमानत कैसे मिलती है?

प्रश्न यह है कि अधिवक्ता को यदि फीस / शुल्क प्राप्त नहीं होता है, तो क्या अधिवक्ता, क्लाइंट को उसके अदालती दस्तावेज वापस करने से मना कर सकता है, जिससे वह उस क्लाइंट को अपने अदालती दस्तावेजों को वापस लेने के लिए भुगतान करने के लिए विबस कर सके? दूसरे शब्दों में, क्या एक अधिवक्ता के पास धारण का अधिकार (Right to Lien) है, कि वह अपने क्लाइंट के अदालती दस्तावेज को उस समय तक अपने पास रख सकते हैं जब तक उसकी फीस / शुल्क  का क्लाइंट द्वारा अदा नहीं किया जाता है ।

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अधिवक्ता कौन होता है?

अधिवक्ता वह व्यक्ति होता है जो कानून की अभ्यास करता है । ऐसा व्यक्ति या तो एक पैरालीगल हो सकता है, एक अधिवक्ता , बैरिस्टर, अटॉर्नी, काउंसलर, सॉलिसिटर या एक चार्टर्ड लीगल एग्जीक्यूटिव हो सकता है । एक अधिवक्ता के तौर पर काम करने के दौरान, एक व्यक्ति कई कानूनी समस्याओं को सुलझाने के लिए, अमूर्त कानूनी नियमो और ज्ञान के व्यावहारिक अनुप्रयोग को शामिल करता है । इसके अतिरिक्त एक अधिवक्ता, उन व्यक्तियों के कानूनी हितों को आगे जारी रखने के लिए काम करता है, जो व्यक्ति ऐसे अधिवक्ता की कानूनी सेवाएं लेने के लिए उसको अपनाते हैं । एक अधिवक्ता की भूमिका, कानूनी क्षेत्राधिकार के केस में अलग – अलग प्रकार की होती है, और इसलिए एक अधिवक्ता को सिर्फ  सामान्य शब्दों में ही परिभाषित किया जा सकता है ।

वकीलों को अपनी कार्यों का विज्ञापन देने की अनुमति क्यों नहीं है ?

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत ‘ग्रहणाधिकार’

CHAPTER – II – Standards of Professional Conduct and Etiquette (Rules under Section 49 (1) (c) of the Act read with the Proviso thereto) BAR COUNCIL OF INDIA RULES के नियम 28 और 29 के तहत, अधिवक्ता अपनी फीस के तौर पर, जिस केस के लिए उसे अधिवक्ता के तौर पर नियुक्त किया गया था, उस केस  की समाप्ति पर, अधिवक्ता के पास बचे क्लाइंट द्वारा दिए गए पैसे एवं केस के दौरान लिए हुए पैसे को अपने पास रख सकता है । यह अधिकार तो बार काउन्सिल के नियमों के तहत दिया जाता है, परन्तु अधिनियम के तहत उसे केस से जुड़े दस्तावेजों को लेकर कोई ग्रहणाधिकार प्रदान नहीं किया जाता है । हमें  यह पता है कि भारत में बहुत से अनपढ़ व्यक्ति भी केस में पक्षकार बनते हैं एवं वे एक अधिवक्ता की सेवाएं लेते हैं, ऐसी समय में, यह उचित नहीं हो सकता है कि अधिवक्ता को उसके द्वारा बताई गई फीस के लिए,केस से सम्बंधित दस्तावेज को अपने पास रख लेने की आज्ञा दी जाये । यदि ऐसी आज्ञा दी जाएगी तो ऐसा कोई ग्रहणाधिकार,क्लाइंट के शोषण के रास्ते खोल देगा ।

यहाँ पर अधिवक्ता का यह कर्तव्य है कि वह अपने क्लाइंट की दस्तावेज को वापस कर दे (केस समाप्त होने पर या अधिवक्ता बदलने की अवस्था में), तो क्लाइंट को भी यह अधिकार होता है कि वह अपने अधिवक्ता से दस्तावेज वापस ले सके, यह तब और अधिक आवश्यक हो जाता है जब केस न्यायालय में अभी भी जारी हो । क्लाइंट के इस अधिकार को, अधिवक्ता के पेशेवर कर्तव्य (Professional Duty) के संगत समकक्ष के तौर पर पढ़ा जाना आवश्यक है ।

सांसद / विधायक वकालत कर सकते हैं या नहीं

अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 में अनुमानित ‘कदाचार’ (Misconduct) को परिभाषित नहीं किया गया है । यह धारा, ‘कदाचार, पेशेवर या अन्यथा’ अभिव्यक्ति का प्रयोग करती है । कदाचार शब्द एक विस्तृत शब्द है । इसे विषय वस्तु के संदर्भ में समझा जाना आवश्यक है । इसका शाब्दिक अर्थ है ‘गलत आचरण’ या ‘अनुचित आचरण’ |

In re A Solicitor ex parte the Law Society [(1912) 1 KB 302] के केस में जस्टिस चार्ल्स डार्लिंग ने टिपण्णी की थी कि: यदि यह दिखाया जाता है कि एक अधिवक्ता ने अपने पेशे के तहत कार्य करते हुए ऐसा कुछ किया है, जो उपयुक्त तौर पर अपमानजनक या बेईमानी के तौर पर देखा जा सकता है तो यह पेशेवर का अच्छा व्यवहार है ।

जॉर्ज फ्रिएर ग्राहम बनाम अटॉर्नी जनरल, फिजी (1936 PC 224) के केस में भी इस परिभाषा को मान ली थी । हमारे यहाँ क्लाइंट को उसकी दस्तावेज वापस करने से मना करने के केस में, वकील को अधिनियम की धारा 35 के अंतर्गत कदाचार का अपराधी माना जाता है । यही बात आरडी सक्सेना के केस में अभिनिर्णित की गयी थी ।

भारतीय संविदा अधिनियम 1872 की धारा 171 के तहत अधिवक्ता का ग्रहणाधिकार?

हमारे यहाँ पर भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 171 के अंतर्गत, जनरल बैलेंस ऑफ़ अकाउंट के लिए, प्रतिभूति (Security) के तौर पर किसी भी ‘माल’ (Goods) को अपने पास सुरक्षित रखने के लिए उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं को आज्ञा दी जाती है । इस उपयोग के लिए ‘माल’ और ‘उपनिधान’ (Bailment) के मतलब को समझना चाहिए । माल विक्रय अधिनियम 1930 की धारा 2 (7) के अंतर्गत

निर्णय, डिक्री और आदेश में अंतर क्या है

‘माल’ से अनुयोज्य अधिकार और धन से अलग हर तरह की जंगम संपत्ति अभिप्रेत है तथा इसके तहत स्टॉक और अंश, उगती फसलें, घास और भूमि से बद्ध या उसकी भागरूप ऐसी चीज़ें जिनका विक्रय से पहले या विक्रय संविदा के अधीन, भूमि सेअलग किया जाने का मुकर्रर किया गया हो, शामिल हैं ।

वहीँ भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 148 के तहत,

“उपनिधान’ एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को किसी प्रयोजन के लिए इस संविदा पर माल का परिदान करता है कि जब वह प्रयोजन पूरा हो जाए तब वह लौटा दिया जाएगा; या उसे परिदान करने वाले व्यक्ति के निदेशों के अनुसार अन्यथा व्ययनित कर दिया जाएगा।”

आरडी सक्सेना के मामले में उच्चतम न्यायालय ने इन परिभाषाओं की विवरण की और यह माना कि ‘माल’, बाजार में बिक्री योग्य होना आवश्यक है और जिस व्यक्ति को वह ‘माल’ प्रतिभूति के तौर पर  दिया जाता है, वह उस माल का, धन के बदले में निपटान करने की समय में होना आवश्यक है । रिकॉर्ड और मामला के पेपर और मूल फाइल की प्रतियों वाली फाइलों को ‘माल’ के तौर पर नहीं देखा जा सकता है ।

मानहानि का दावा क्या होता है

अंत में पी. कृष्णामाचारी बनाम ऑफिसियल असाइनी मद्रास (एआईआर 1932 मद्रास 256) के केस में डिवीजन बेंच ने कहा था कि एक अधिवक्ता के पास इस तरह का ग्रहणाधिकार नहीं हो सकता है, जब तक कि इसके विपक्ष क्लाइंट के साथ उसका कोई समझौता न हो । यह शायद तार्किक लगे कि अगर क्लाइंट ने अधिवक्त को उसके निर्धारित फीस / शुल्क को अदा करने से मना किया है, तो अधिवक्ता को क्लाइंट के अदालती फाइलों के ग्रहणाधिकार की आज्ञा दी जानी आवश्यक, लेकिन इसके ठीक विपरीत, न्यायालयों ने अपने कई निर्णयों में यह बताया है किअधिवक्ता को फीस / शुल्क देने में असफल रहने पर भी,  क्लाइंट के फाइलों को अपने पास रखने का अधिवक्ता के पास कोई अधिकार नहीं होता है ।

आजीवन कारावास क्या होता है

इस लेख में हमने आप को वकील को क्लाइंट द्वारा फीस न प्राप्त हो तो क्या उस स्थिति में उसके कागज़ात वापस करने से मना कर सकते हैं या नहीं  इसके विषय में विस्तार से जानकारी दी है अगर आप के मन में इस लेख से संबंधित कोई प्रश्न हैं तो कमेंट के द्वारा पूछ सकते हैं हम आप के द्वारा की प्रतक्रिया का आदर करेगें |

भारतीय साक्ष्य अधिनियम क्या है

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