गिरफ्तारी के बाद जमानत कैसे मिलती है?

गिरफ्तारी के पश्चात हिरासत होती है, परन्तु यह आवश्यक नहीं होता है कि हिरासत के सभी केश में पहले गिरफ्तारी हो । उदाहरण के रूप में, जब कोई व्यक्ति न्यायालय के समक्ष स्वयं हाजिर होता है तो वह हिरासत में होता है, इस केश में गिरफ्तारी नहीं होती है । सामान रूप से हिरासत का मतलब एक व्यक्ति को नियम में बाँधकर रखना या उस पर निगाह रखना है । इसका आशय किसी व्यक्ति के अपनी इच्छा के अनुसार कहीं आने-जाने पर रोक से है ।

गिरफ्तारी के बाद जमानत कैसे मिलती है?

हिरासत भारतीय अधिनियम के अनुच्छेद 21 के अनुसार व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर सीधा आक्रमण है, इसलिए, यह निश्चित करने के लिए कानून में एक विस्तृत प्रकरण बनाई गई है कि किसी व्यक्ति को केवल कानूनी ध्येय के लिए ही अधिकारी के माध्यम से उचित, तरीके से हिरासत में लिए जाये |

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‘गिरफ्तारी’और ‘हिरासत’

पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को बलपूर्वक कैद में रखना गिरफ्तारी होता है । हिरासत के पहले गिरफ्तारी होती है, लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि हिरासत के सभी केश में पहले गिरफ्तारी ही हो । उदाहरण के रूप में, जब कोई व्यक्ति न्यायालय में  स्वयं हाजिर होता है तो वह व्यक्ति हिरासत में होता है, इस केश में गिरफ्तारी नहीं होती है ।

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न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने ‘निरंजन सिंह बनाम प्रभाकरण राजाराम खरोटेकेश में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 438 के अंतर्गत हिरासत में शब्द की व्याख्या करते हुए बताया गया है |

वह व्यक्ति केवल उस दौरान ही हिरासत में नहीं माना जाता है, जब पुलिस उसे गिरफ्तार करती है, उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करती है और उसे न्यायिक या अन्य कस्टडी पर रिमांड में लेती है । उसे उस दौरान भी हिरासत में माना जा सकता है जब वह न्यायालय में स्वयं हाजिर होता है और उसके आदेशों को मान लेता है ।

यदि कोई अभियुक्त ने सत्र न्यालय में स्वयं हाजिर होता है, तो सत्र न्यालय सीआरपीसी की धारा 439 के अंतर्गत जमानत याचिका पर विचार विमर्श करने का अधिकार क्षेत्र प्राप्त कर लेता है ।

निरंजन सिंह केश का पालन करते हुए उच्चतम न्यायालय ने 2014 में व्यवस्था दी थी कि यदि उच्च न्यायालय ने किसी अपराधी को अपने सामने स्वयं हाजिर करने की आज्ञा दी है, तो वह  व्यक्ति उच्च न्यायालय की हिरासत में होगा । इसलिए,उच्च न्यायालय को सीआरपीसी की धारा 439 के अंतर्गत  नियमित जमानत के लिए आवेदन पर विचार विमर्श करने का अधिकार होगा ।

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पुलिस हिरासत

जब एक व्यक्ति को संज्ञेय जुर्म करने के संदिग्ध में एक पुलिस अधिकारी गिरफ्तार करता है, तो गिरफ्तार व्यक्ति को हिरासत में रक्खा गया बताया जाता है । पुलिस हिरासत का मकसद होता है कि जुर्म के विषय में अधिक जानकारी जुटाने के लिए संदिग्ध से पूछताछ करना है, और सबूतों को मिटाने से रोकना और गवाहों को अपराधी द्वारा डरा-धमकाकर केश को प्रभावित करने से बचाना है । यह हिरासत मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 24 घंटे से अधिक नहीं हो सकती ।

पुलिस द्वारा किये गये गिरफ्तार व्यक्ति और हिरासत में रखे गए प्रत्येक व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिसमें गिरफ्तारी के स्थान से लेकर मजिस्ट्रेट के कोर्ट तक के पहुंचने का आवश्यक समय शामिल नहीं होगा । मजिस्ट्रेट के निर्देश के बिना किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता है ।

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न्यायिक हिरासत

जब पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तो उसके पास दो विकल्प होते हैं, अपराधी को पुलिस हिरासत में या न्यायिक हिरासत में भेजना ।

यह सीआरपीसी की धारा 167(2) के नियमो से साफ है कि मजिस्ट्रेट को जो सही लगता है उस तरह की हिरासत वह अपराधी के लिए तय कर सकता है ।

जब कोई व्यक्ति पुलिस हिरासत में होता है तो, पुलिस के पास अपराधी की शारीरिक हिरासत होगी । इसलिए जब पुलिस हिरासत में भेजा जायेगा, तो अपराधी को पुलिस स्टेशन के लाकब में बंद कर दिया जाएगा । उस परिदृश्य में, पुलिस को पूछताछ करने के लिए अपराधी तक हर वक्त पहुंच होगी ।

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जब कोई व्यक्ति न्यायिक हिरासत में होता है तो, अभियुक्त मजिस्ट्रेट की हिरासत में होगा और उसे जेल भेजा जाएगा । न्यायिक हिरासत में रखे गये अपराधी से पूछताछ  करने के लिए पुलिस को संबंधित मजिस्ट्रेट कीआदेश लेनी होगी । मजिस्ट्रेट की आदेश से ऐसी हिरासत के समय पुलिस के माध्यम से पूछताछ, हिरासत की प्रकृति को बदल नहीं सकती है |

धारा 167 के अंतर्गत यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक समयसाओं में गिरफ्तारी एक पुलिस अधिकारी के माध्यम से ही होनी चाहिए, किसी और माध्यम से नहीं तथा मामला डायरी की प्रविष्टियां का रिकॉर्ड आवश्यक तौर पर होना आवश्यक है । इसलिए, हिरासत निश्चित रूप से एक समर्थवान् अधिकारी या गिरफ्तारी का अधिकार प्राप्त अधिकारी द्वारा इस मान्यता कि ‘अपराधी संबंधित कानून / नियम केअंतर्गत  दंडनीय अपराध का अपराधी हो सकता है’, पर विचार करते हुए गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को समर्थवान् मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करने पर ही संभव होगा, बावजूद इसके कि जिस अधिकारी ने गिरफ्तारी की है वह सही तौर पर पुलिस अधिकारी नहीं है ।

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गिरफ्तारी के शुरवाती पंद्रह दिनों के पश्चात पुलिस हिरासत नहीं

गिरफ्तारी के पश्चात मजिस्ट्रेट के सामने पेशी के शुरवाती 15 दिनों के अंदर ही अपराधी को पुलिस हिरासत में भेजा जा सकता है । सीआरपीसी की धारा 167(दो) का उपबंध-ए कहता है कि मजिस्ट्रेट पुलिस हिरासत में 15 दिनों की समय से परे अभियुक्तों की हिरासत समय बढ़ाने की आज्ञा दे सकता है ।

नजरबंदी को आमतौर पर कानून मंजूरी पुलिस हिरासत में नहीं देता । धारा 167 का मकसद अभियुक्तों को उन रास्तों से बचाना है, जिन्हें “कुछ अति उत्साही और बेईमान पुलिस अधिकारियों” द्वारा अपनाया जा सकता है ।

सामान्य भाषा, खासकर “पुलिस की हिरासत से अन्यथा पंद्रह दिनों की समय से परे” शब्दों पर विचार करते हुए यह व्यवस्था उपलब्ध कराइ गयी है कि शुरवाती पंद्रह दिनों की समय पूरा होने के पश्चात 90 दिनों या 60 दिनों की शेष समय के लिए सिर्फ  न्यायिक हिरासत ही होगी तथा यदि पुलिस हिरासत आवश्यक हुई तो इसका आदेश केवल शुरवाती 15 दिनों के अंदर ही हो सकता है ।

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उच्चतम न्यायालय ने कहा है

सुप्रीम कोर्ट  के कथना अनुसार “इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि संबंधित धारा में अंतर्निहित सम्पूर्ण उद्देश्य पुलिस हिरासत अवधि को सीमित करना है। हालांकि, गंभीर प्रकृति के मामलों की जांच पूरी होने में उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए विधायिका ने अभियुक्तों को 90 दिनों की विस्तारित अवधि के लिए डिटेंशन बढ़ाने के प्रावधान किये हैं, लेकिन इस प्रावधान में स्पष्ट किया गया है कि इस प्रकार का डिटेंशन केवल न्यायिक हिरासत ही होगी। इस अवधि के दौरान पुलिस से गंभीर मामलों में भी जांच पूरी होने की अपेक्षा की जाती है। अन्य अपराधों के मामले में साठ दिनों की अवधि में जांच पूरी होने की उम्मीद की जाती है ।”

अगर मजिस्ट्रेट संतुष्ट है तो मृत्युदंड, आजीवन कारावास या 10 साल की जेल की सजा वाले ऐसे बड़े जुर्मों के लिए न्यायिक हिरासत 90 दिनों तक तथा अन्य जुर्मों के लिए 60 दिनों तक बढ़ायी जा सकती है ।

यदि समस्यां न्यायोचित लगती हैं, तो सीआरपीसी की धारा 167 (दो) के अंतर्गत उल्लेखित नियमो के अनुरूप निर्धारित समय सीमा (15 दिन में) न्यायिक हिरासत में भेजे गये अपराधी को पुलिस हिरासत और पुलिस हिरासत से न्यायिक हिरासत में भेजा जा सकता है ।

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कई जुर्म करने के अपराधी को पुलिस हिरासत

यदि पुलिस को यह पता है कि अपराधी एक संदिग्ध जुर्म के लिए पहले से ही हिरासत में हो और वह कुछ अन्य जुर्मों से भी जुड़ा है, तो क्या अन्य जुर्मों के बारे में पुलिस हिरासत मांगी जा सकी है, भले ही अपराधी  ने पहले जुर्म के लिए 15 दिनों की पुलिस हिरासत बिता ली हो ?

हां, बशर्ते कि दूसरे जुर्मों को उस जुर्म से अलग किया जा रहा हो, जिसके बारे  में उसे पहली बार हिरासत में लिया गया था ।

हां, बशर्ते अन्य जुर्म उस पहले वाले जुर्म से अलग हों जिसके लिए उसे पहली बार पुलिस हिरासत में लिया गया था । जिस मामला के लिए अपराधी को पहले ही पुलिस हिरासत में ले लिया गया था और उस मामला की जांच के समय और अधिक गम्भीर जुर्मों के बारे में पता चलता है तो पुलिस अपराधी को 15 दिन से ज्यादा के लिए हिरासत में लेने के लिए अधिकृत नहीं होगी |

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सुप्रीम कोर्ट ने ‘केंद्रीय जांच ब्यूरो, विशेष जांच प्रकोष्ठ-1, नयी दिल्ली बनाम अनुपम जे. कुलकर्णी एआईआर 1992, एससी 1768’ केश में इस स्थिति की विस्तृत व्याख्या कर दी है ।

“एक घटना में ऐसा हो सकता है कि आरोपी ने कई अपराध किए हों और पुलिस उसे उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर एक या दो अपराधों के सिलसिले में गिरफ्तार कर सकती है और पुलिस हिरासत हासिल कर सकती है। यदि जांच के दौरान अधिक गंभीर मामलों में आरोपी की संलिप्तता पायी जाती है तो पहले 15 दिनों की कस्टडी के बाद पुलिस आगे की अवधि के लिए कस्टडी नहीं मांग सकती।

यदि इसकी अनुमति दी जाती है तो पुलिस विभिन्न चरणों में गंभीर प्रकृति के कुछ अपराध जोड़ सकती है और बार-बार पुलिस हिरासत की मांग कर सकती है, इस प्रकार धारा 167 में अंतर्निहित महत्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो सकेगी।

हालांकि यह प्रतिबंध दूसरी घटना पर लागू नहीं होगा, जिसमें गिरफ्तार आरोपी की संलिप्तता का खुलासा होता है। यह एक अलग ही मामला बनेगा और अगर एक अभियुक्त एक मामले में न्यायिक हिरासत में है और पुलिस को दूसरे मामले की जांच में उस व्यक्ति की आवश्यकता है तो उसे दूसरे मामले में औपचारिक तौर पर गिरफ्तार किया जाना चाहिए और फिर पुलिस हिरासत के लिए मजिस्ट्रेट का आदेश प्राप्त करना चाहिए।”

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एस. हरसिमरन सिंह बनाम पंजाब सरकार, 1984 के केश में इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या धारा 167(दो) में उल्लेखित 15 दिनों की पुलिस हिरासत की सीमा एक ही केश पर लागू है या समान अभियुक्त वाले अलग – अलग केशों पर पारित होती है? न्यायालय ने व्यवस्था दी थी (ऊपर लेख में बतया गया है)

“हमें एक अपराध के संदर्भ में हिरासत में रखे गये एक अपराधी की दूसरे अपराध की जांच के लिए फिर से गिरफ्तारी न करने को लेकर कोई ठोस प्रतिबंध नजर नहीं आता। दूसरे शब्दों में, अन्य अपराध की जांच के लिए सीआरपीसी की धारा 167(दो) के तहत मजिस्ट्रेट के आदेश द्वारा न्यायिक हिरासत को पुलिस हिरासत में बदले जाने में कोई बाधा नहीं है। इसलिए एक अलग मामले में फिर से गिरफ्तारी या दूसरी गिरफ्तारी कानून से परे नहीं है ।”

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने कुलकर्णी केश में व्यवहार के योग्य करार दिया था।

पंद्रह दिन पूरा हो जाने के पश्चात अभियुक्त को पुलिस हिरासत में बंद नहीं किया जा सकता, भले ही उसी मामला से संबंधित कुछ अन्य जुर्मों में उस अपराधी की संलिप्तता के विषय में बाद में जानकारी क्यों न मिला हो? (बुध सिंह बनाम पंजाब सरकार (2000)9 एससीसी266)

जनहित याचिका (PIL) क्या है

जब आगे की जांच करने के समय अपराधी को गिरफ्तार किया जाता है –

सीआरपीसी की धारा 309(दो) के नियम किसी अपराधी को संज्ञान लेने के पश्चात हिरासत में भेजने के न्यायालय के अधिकार की व्याख्या करता है । यह रिमांड केवल न्यायिक हिरासत भी हो सकती है । तो, क्या जुर्म-पत्र पेश करने के पश्चात आगे की जांच के चरण में गिरफ्तार अपराधी को पुलिस रिमांड पर भेजा जा सकता है ? क्या ऐसे अभियुक्त को सीआरपीसी की धारा 309(दो) के नियमों के देखते हुए केवल न्यायिक हिरासत में भेजा जा सकता है ?

सुप्रीम कोर्ट ने इन प्रश्नों का उत्तर सीबीआई बनाम दाऊद इब्राहिम कास्कर के फैसले में बताया था । न्यायालय ने व्यवस्था दी कि आगे की जांच करने के चरण में गिरफ्तार किये गये अपराधी के रिमांड का केश धारा 167(दो) के अंतर्गत निपटा जाना चाहिए, न कि धारा 309(दो) केनियमों के अंतगत । क्योंकि जहां तक उस अपराधी का संदर्भ है तो जांच अब भी जारी है और पुलिस को उसकी हिरासत देने से इन्कार नहीं किया जा सकता ।

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न्यायालय (Court) ने व्यवस्था दी

इन बात में कोई संदिग्ध नहीं हो सकता कि उपरोक्त उपखंड के पहले नियम में वर्णित रिमांड और हिरासत धारा 167 के अंतर्गत ‘डिटेंशन इन कस्टडी’ से अलग हैं । पहले के नियमों केअंतर्गत रिमांड केश के संज्ञान के चरण से जुड़ा होता है और ऐसे केश में न्यायिक हिरासत में हो सकती है, लेकिन बाद में नियमों के अंतर्गत डिटेंशन जांच के चरण से जुड़ा होता है और शुरवात में या तो पुलिस हिरासत या न्यायिक हिरासत में से एक हो सकती है । यद्यपि किसी जुर्म का संज्ञान लेने के पश्चात भी पुलिस को केश  की आगे की जांच करने का अधिकार रहेगा ही, जिसे केवल अध्याय-12 के अनुरूप  प्रयोग किया जा सकता है । हमें इस बात का कोई कारण नहीं दिखता कि क्यों धारा 167 के नियम उस व्यक्ति पर लागू नहीं होगा, जो जांच के क्रम में पुलिस अधिकारी द्वारा बाद में गिरफ्तार किया जाता है ।

जिस प्रकार मंसूरी केश में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने व्याख्या की है, उससे धारा 309 (दो) की व्याख्या होनी है, इसका अर्थ है कि जब न्यायालय किसी जुर्म का संज्ञान लेता है, तो वह सीआरपीसी की धारा 167 के अंतर्गत पुलिस हिरासत में रखने के अपने अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता। जांच कमिटी आगे की जांच करने के समय गिरफ्तार व्यक्ति से पूछताछ के अवसर से बच नहीं सकती, भले ही उसे पर्याप्त मात्रा में सामग्रियां प्रस्तुत करके न्यालय को यह संतुष्ट करना पड़े कि उस व्यक्ति की पुलिस हिरासत आवश्यक थी ।

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इसलिए हमारा मानना है कि धारा 309(दो) के अंतर्गत वर्णित शब्द ‘एक्यूज्ड इफ इन कस्टडी’ का संदर्भ एक वैसे अपराधी से है, जो संज्ञान लेते समय या उसके केश में जांच या मुकदमा शुरू होने के उपरांत न्यायालय के सामने था । इससे उस अपराधी का मायने नहीं है जो आगे की जांच के क्रम में गिरफ्तार किया गया हो ।

संज्ञान लेने के पश्चात गिरफ्तार किये गये भगोड़े अपराधी की पुलिस हिरासत

दाऊद इब्राहिम केश में इस सिद्धांत का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बाद में व्यवस्था उपलबध कराइ कि आरोप पत्र पेश करने के पश्चात गिरफ्तार किये गये भगोड़े अपराधी को पुलिस हिरासत में भेजा जा सकता है । उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके अंतर्गत यह कहते हुए पुलिस रिमांड देने से मना कर दिया गया था कि रिमांड 309(दो) के अंतर्गत थी ।

संदर्भ :-

  • सीआरपीसी की धारा 46 बताती है कि पुलिस अधिकारी या समर्थवान् अधिकारी को गिरफ्तार किये जाने वाले व्यक्ति का शरीर छूना या जेल में भेजना होगा ।
  • निरंजन सिंह बनाम प्रभाकर राजाराम खरोटे, एआईआर 1980 एससी 785
  • आईबिड
  • संदीप कुमार बाफना बनाम महाराष्ट्र सरकार, एआईआर 2014 एससी 1745
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(एक)
  • सीआरपीसी की धारा 57
  • ज्ञान सिंह बनाम दिल्ली प्रशासन 1981 सीआरआईएलजे100
  • प्रवर्तन निेदेशालय बनाम दीपक महाजन एआईआर 1994 एससी 1775
  • केद्रीय जांच ब्यूरो, स्पेशल इंवेस्टीगेशन सेल-1, नयी दिल्ली बनाम अनुपम जे कुलकर्णी, एआाईआर 1992 एससी 1768
  • आईबिड
  • आईबिड
  • कोसानापु रामरेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश सरकार एवं अन्य, एआईआर 1994 एससी 1447
  • एआईआर 1997 एससी 2424
  • सीबीआई बनाम रतीन दंडापट और अन्य एआईआर, 2015 एससी 3285

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इस लेख में हमने आप को गिरफ्तारी के पश्चात हिरासत होती है, परन्तु यह आवश्यक नहीं होता है कि हिरासत के सभी केश में पहले गिरफ्तारी हो । उदाहरण के रूप में, जब कोई व्यक्ति न्यायालय के समक्ष स्वयं हाजिर होता है तो वह हिरासत में होता है, इस केश में गिरफ्तारी नहीं होती है  इसके विषय में विस्तार से जानकारी दी है अगर आप के मन में इस लेख से संबंधित कोई प्रश्न हैं तो कमेंट के द्वारा पूछ सकते हैं हम आप के द्वारा की प्रतक्रिया का आदर करेगें  |

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