रेप केस में सजा के प्रावधान

बलात्कार का जुर्म पूरे हिंदुस्तान को हिला दिया है तथा यह जुर्म हमारे समाज के लिए एक महामारी के तौर पर देखने को मिल रहा है । राज्य और भारतीय विधान के माध्यम से इस जुर्म को रोकने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं । हमारे यहाँ सामाज में बलात्कार का जुर्म एक लांछन बनकर आया है, अलग – अलग सामाजिक जगहों पर बलात्कार को रोकने के लिए अत्यंत प्रयास किए जा रहे हैं । बलात्कार जैसे जुर्म से सिर्फ वयस्क महिलाएं ही पीड़ित नहीं हैं, बल्कि दुधमुंही बच्चियां भी बलात्कार जैसे गंभीर जुर्म से परेशान हो रही हैं । दोषी दुधमुंही बच्चियों के भी बलात्कार कर के उनकी हत्या भी कर दे रहे हैं । कुछ दिन पहले एक साल की बच्ची का बलात्कार किया गया तथा बलात्कार के बाद में उस बच्ची की हत्या भी कर दी जाती है ।

रेप केस में सजा के प्रावधान

श्री बुद्धिमान गौतम बनाम शुभ्रा चक्रवर्ती एआईआर 1996 एस सी 922 के केस में उच्चतम न्यायालय के माध्यम से यह अभिनिर्धारित किया जाता है कि बलात्कार का जुर्म मानव अधिकारों के खिलाफ जुर्म है । इससे जीवित रहने के अधिकार का अतिक्रमण होता है । अगर कोई शिक्षक अपनी महिला शिष्य के साथ ईश्वर के समक्ष शादी कर के उसके साथ संभोग करता है और उसके बाद में गर्भपात कराता है तथा बाद में उसे अपने पत्नी के रूप में अपनाने से मना कर देता है तो यह घिनौना कार्य है । उच्चतम न्यायालय ने इस केस को नितांत गंभीर तौर पर लिया तथा केस में विचार करने के समय तक शिक्षक से ₹1000 मुआवजा के तौर पर दिलाए जाने का आदेश दिया जाता है ।

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क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो अधिवक्ता नहीं है, न्यायालय में किसी केस की पैरवी कर सकता है? 

बलात्कार के जुर्म के विषय में भारतीय दंड संहिता में दो धाराओं को रखा गया है । धारा 375 और धारा 376

धारा 375

  • भारतीय दंड संहिता की धारा बलात्कार की परिभाषा के विषय में है । यह धारा बलात्कार के बारे में साफ – साफ बताती है ।
  • बलात्कार एक ऐसा जुर्म है जिसमें संभोग के साथ महिला की सहमति पर सवाल उठता है । इस धारा के तहत संभोग की परिभाषा भी दी जाती है । किसी भी समय लिंग का योनि में प्रवेश होना संभोग माना जाता था, लेकिन समय के साथ इस परिभाषा में बदलाव किए गए है ।
  • सन 2013 में इस धारा के तहत कानून में  सुधार किए गए हैं । संभोग की अलग परिभाषा दी जाती है । भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत  संभोग निम्न प्रकार से हो सकता है –

कोई पुरुष-

  • किसी स्त्री की योनि, उसके मुंह, मूत्र मार्ग या गुदा में अपना लिंग किसी भी स्तर पर प्रवेश करता है या उससे ऐसा अपने किसी अन्य व्यक्ति के साथ कराता है या
  • किसी स्त्री की योनि, मूत्र मार्ग,या गुदा में ऐसी कोई वस्तु यह शरीर का कोई भाग जो लिंग ना हो किसी भी सीमा तक अनुप्रविष्ट करता है या उससे ऐसा अपने किसी अन्य व्यक्ति के साथ कराता है या
  • किसी स्त्री के शरीर में किसी भाग का इस प्रकार हस्तसाधन करता है जिससे किसी स्त्री की योनि, गुदा, मूत्र मार्ग शरीर के किसी भाग में प्रवेशन कारित किया जा सके या उससे ऐसा अपने किसी अन्य व्यक्ति के साथ कराता है या
  • किसी स्त्री की योनि, गुदा, मूत्र मार्ग पर अपना मुंह लगाता है या उससे ऐसा अपने या किसी अन्य व्यक्ति के साथ कराता है ।
  • इस प्रकार का कोई भी काम सात समस्याओं के मातहत करता है, जिनका वर्णन दंड संहिता की धारा 375 के मातहत किया जाता है तो ऐसा मान लिया जाता है कि उसने बलात्कार किया है ।

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ऊपर बताये गए लेख में संभोग के परिभाषा से यह प्रस्तुत होता है कि दंड संहिता के भीतर संभोग की परिभाषा को महिला के पक्ष में नितांत विस्तृत कर दिया जाता है तथा योनि पर मुंह लगाना या फिर उंगली डालना ये भी बलात्कार माना जाएगा और इस तरह का संभोग करना ही जुर्म नहीं है बल्कि ऐसा संभोग करवाना भी जुर्म है ।

वे सात समस्याएं निम्न प्रकार हैं –

  • पहला-उस स्त्री की इच्छा के विरुद्ध ।
  • दूसरा-उस स्त्री की सहमति के बिना ।
  • तीसरा-उस स्त्री की सम्मति से जब उसकी सम्मति उसे या ऐसे किसी व्यक्ति को जिससे वह हितबद्ध है, मृत्यु या उपहति के भय में डालकर अभिप्राप्त की गई है ।
  • चौथा- उस स्त्री की सम्मति से जब कि वह पुरुष यह जानता है कि वह उसका पति नहीं है और उसने सम्मति इस कारण दी है कि वह यह विश्वास करती है कि ऐसा अन्य पुरुष है जिससे वह विधिपूर्वक विवाहित है या विवाहित होने का विश्वास करती है ।
  • पांचवा- उस स्त्री की सम्मति से जब ऐसी सम्मति देने के समय वह विकृतचित्त या मत्तता के कारण या उस पुरुष द्वारा व्यक्तिगत रूप से किसी अन्य के माध्यम से कोई संज्ञाशून्यकारी या अस्वास्थ्यकर पदार्थ दिए जाने के कारण उस बात की जिसके बारे में वह सम्मति देती है, प्रकृति और परिणामों को समझने में असमर्थ है ।
  • छठवां- उस स्त्री की सम्मति से या उसके बिना जब 18 वर्ष से कम आयु की है ।
  • सातवा- जब स्त्री सम्मति संसूचित करने में असमर्थ है ।

जब यह सात समस्याओं में किसी महिला के साथ ऊपर बताई गई संभोग की परिभाषा के तहत संभोग किया जाता है तो बलात्कार का जुर्म कहा जाता है ।

बलात्कार के जुर्म के विषय में परिभाषा अत्यंत विस्तृत है क्योंकि सिर्फ सहमति नहीं होना ही जुर्म नहीं माना जाता है बल्कि यह सहमति किस प्रकार से की जाती है इस पर भी ध्यान दिया जाता है  । यह सहमति डरा कर, धमका कर,नशा की दवा देकर और पति होने का भरोसा दे कर या फिर विकृत चित्त महिला से या फिर सहमति दे पाने में असमर्थ महिला से ली गयी है तो ऐसे सहमति में किये गए सम्भोग को बलात्कार कहा जाता है ।

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अवयस्क के विषय में

नाबालिग महिला जो 18 वर्ष की न हो तो उस महिला के साथ भी संभोग को बलात्कार माना जाता है । भले ही संभोग करने में उस महिला की सहमति रही हो,उसने साफ – साफ शब्दों में ऐसी सहमति दे दी थी । ऐसी सहमति होने के पश्चात भी व्यक्ति बलात्कार का अपराधी माना जाएगा,यदि वह व्यक्ति किसी भी 18 वर्ष से कम उम्र की महिला के साथ संभोग करता है ।

इस केस में लालता प्रसाद बनाम स्टेट ऑफ़ मध्य प्रदेश एआईआर 1997 एससी 1276 का इस प्रकार है । इस बात का साक्ष्य (सबूत) नहीं था कि महिला की उम्र 16 साल से कम थी, उसके साथ उसकी सहमति के बगैर लैंगिक संभोग किया जाता था अतः यह विचार किया गया कि व्यक्ति बलात्कार का अपराधी नहीं था ।

बलात्कार के जुर्म में क्या साक्ष्य (सबूत) हो सकते हैं

बलात्कार के जुर्म में प्रत्यक्ष गवाही देने वाले का कमी होता है । अदालत को बलात्कार के केस में साक्ष्य (सबूत) के विषय में नित्यांत सावधानी राखनी होती है और सावधानी के माध्यम से ही केस का मूल्यांकन, छानबीन करना होता है । बलात्कार से क्लेशित महिला की गुप्तांगों पर चोट के पद चिन्ह होना, उसके कपड़ों पर खून के दाग धब्बों का निशान होना या तो मामला के तुरंत पश्चात अपने माता-पिता को इस मामले के बारे में जानकारी देना कुछ ऐसे वास्तविक घटना जो बलात्कार के जुर्म को सिद्ध करने में मदद करते हैं अतः निर्णय के दौरान इन वास्तविक घटनाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है ।

भूपेंद्र शर्मा बनाम स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश के केस में उच्चतम न्यायालय के माध्यम से यह भी निर्धारित किया जाता है कि बलात्कार के केसों में बलात्कार की शिकार महिला का साक्ष्य (सबूत) प्राप्त हो सकता है, उसकी अच्छी तरह पोषण नहीं चाहिए ।

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इसी तरह सुधांशु शेखर साहू बनाम स्टेट ऑफ उड़ीसा ए आई आर 2003 एसी 4684 के केस में उच्चतम न्यायालय के माध्यम से यह बताया जाता है कि सिर्फ बलात्कार की शिकार महिला की साक्ष्य (सबूत) पर व्यक्ति को दोषी करार किया जा सकता है, लेकिन वह सुरक्षित और विश्वास के योग्य हो ।

बलात्कार सम्बन्धी एफआईआर

बलात्कार के केसों में पहला दृष्टया पहला सूचना प्रतिवेदन अविलंब अंकित कराए जाने की आशा की जाती है परन्तु ये कोई कठोर कानून नहीं होता है । किसी कारण से वो लटकता हुआ हो सकता है सिर्फ विलंब के आधार पर दोष लगाना पक्ष के केस को विश्वास के योग्य नहीं माना जा सकता ।

इस विषय में दिलदार सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब का एक अच्छा मामला है । इसमें एक अध्यापक द्वारा अपने प्रवेश में महिला शिष्य के साथ बलात्कार किया गया था । उस महिला शिष्य ने डर के कारण से इस बात को किसी से नहीं बताई परन्तु जब उसे यह पता चला कि वह गर्भवती हो चुकी है तो 3 माह के  पश्चात उसने पूरे मामला को अपनी माता को बताने के लिए मजबूर होना पड़ा । इस तरह 3 महिने के पश्चात पहला सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई गई जिसे उच्चतम न्यायालय ने इसे क्षमा किए जाने योग्य माना । बलात्कार की एफआई आर में किसी कारण से देर हो सकता है तथा न्यायालय ऐसा उचित कारण मान सकता है और देर को अनदेखा किया जा सकता है ।

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जानिए पत्नी के साथ बलात्कार सम्बन्धी बातें

अभी जल्द ही कई केसों में पत्नी के साथ बलात्कार जैसा मामला भी उभर कर सामने आया है । कई केसों में उच्चतम न्यायालय ने पत्नी के माध्यम से बलात्कार की एफआईआर लिखवाये जाने को वैध भी माना है, लेकिन बाद के केसों में उसे उलट दिया गया ।

धारा 375 के दूसरे लांछन में यह बताया जाता है कि कोई भी महिला जो पुरुष की धर्मपत्नी है । अगर उसके साथ में उसके पति के माध्यम से मैथुन किया जाता है या कोई और सम्भोग प्रक्रिया की जाती है तो ऐसी समस्या में वह महिला बलात्कार का केस नहीं कर सकती है ।

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अगर वह 15 साल से कम उम्र की है तो ऐसी समस्या में वह बलात्कार का केस कर सकती है तथा 15 साल से काम आयु की महिला के साथ में यदि मैथुन किया गया है तो और उन निम्न प्रकार के सात समस्याओं में से कोई समस्या रही तो बलात्कार का जुर्म बन जाता है ।

बलात्कार का व्यक्ति सिर्फ पुरुष होगा

भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत सबसे पहला शब्द पुरुष उपयोग किया जाता है । उसके पश्चात पूरे धारा के तहत बलात्कार जैसे जुर्म का वर्णन किया जाता है । इस जुर्म को बलात्संग भी कहा जाता है ।

किसी भी समस्या में बलात्कार जैसे जुर्म में बलात्कार की मुख्य अभियुक्त महिला नहीं होती है । महिला पर बलात्कार का केश कोई पुरुष को क्लेशित बना कर नहीं चलाया जा सकता क्योंकि बलात्कार की परिभाषा के शुरवात में ही पुरुष शब्द का उपयोग किया जाता  है ।

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इस लेख में हमने आप को बलात्कार की परिभाषा है एवं धारा 375 के विषय में विस्तार से जानकारी दी है अगर आप के मन में इस लेख से संबंधित कोई प्रश्न हैं तो कमेंट के द्वारा पूछ सकते हैं हम आप के द्वारा की प्रतक्रिया का आदर करेगें |

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