जय प्रकाश नारायण का जीवन परिचय और राजनीतिक विचार

जय प्रकाश नारायण (Jai Prakash Narayan )

भारत के निर्माण में जनचेतना जगाने और रचनात्मक सगंठन तैयार करने की अदभुत क्षमता का उदाहरण पेश करने वाले श्री जय प्रकाश नारायण का नाम भारत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखा गया है | महात्मा गाँधी के आदर्शों से प्रेरित जयप्रकाश नारायण एक ऐसे स्वतन्त्रता सग्राम सेनानी थे, जिन्होने अहिंसा के सिद्धान्त को नए विचारों के साथ अपनाया और भारत के निर्माण में कई अहम निर्णय लिए, जिन पर भारत सरकार को गहनता के साथ विचार करना पड़ा | इनकी प्रतिभा को देख कर इन्हें वर्ष 1965 में मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया | इस पेज पर जय प्रकाश नारायण के जीवन परिचय और राजनीतिक विचार के विषय में विस्तार से जानकारी दी जा रही है |

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जीवन परिचय (Life Introduction)

जय प्रकाश नारायण जी का जन्म 11 अक्टूबर, 1902 को बिहार राज्य में छपड़ा नामक जिले के एक गांव सिताबदियारा में हुआ था | इनके पिता का नाम हरसू बाबू और माता का नाम फूलरानी देवी था | हरसू बाबू एक सरकारी कर्मचारी थे | इनकी मातृभाषा भोजपुरी थी | बचपन में जयप्रकाश नारायण को बबूल के नाम से पुकारा जाता था | यह अपने जीवन के प्रथम पांच वर्ष तक बोलने में असमर्थ थे | 6 वर्ष की आयु में इन्होंने बोलना शुरू किया | इसके बाद इनका दाखिला गावं के स्कूल में करा दिया गया था |

बाल्य अवस्था से ही इनकी रुचि नैतिकता व भगवतगीता के सिद्धान्तों के प्रति थी | 12 वर्ष की आयु तक इन्होंने गावं के ही स्कूल से शिक्षा ग्रहण की, इसके बाद इन्हें उच्च शिक्षा के लिए पटना भेज दिया गया | वहां पर इनका दाखिला कालेजिएट स्कूल में करा दिया गया था |

एक बार कालेजिएट स्कूल में परीक्षा में अनुपस्थित रहने के कारण अंग्रेज मुख्याध्यापक ने उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया, जिससे जय प्रकाश नारायण के हृदय में ब्रिटिश शासन के प्रति घृणा जागृती हो गयी | इस स्कूल से इन्होंने दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की इसके बाद उन्होंने पटना कॉलेज में प्रवेश लिया | परीक्षा से कुछ दिन पहले ही यह गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गए, जिसके  कारण यह परीक्षा नहीं दे पाए , बाद में इन्होंने यह परीक्षा बिहार विद्यापीठ से उत्तीर्ण की |

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वैवाहिक जीवन (Married Life)

जय प्रकाश नारायण का विवाह 16 मई, 1920 को प्रभावती देवी से हुआ था | बाबू राजेन्द्र प्रसाद की प्रेरणा स्वरूप उन्होंने कोई भी दहेज नहीं लिया | विवाह के उपरांत उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन में कोई रुचि नहीं ली | वह अपनी धर्म पत्नी की अनुमति लेकर जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहे | इनकी पत्नी कुछ दिन तक अपने मायके में रही | इसके बाद महात्मा गांधी ने प्रभावती देवी जी को अपनी पुत्री का दर्जा देकर उन्हें अपने साबरमती आश्रम में ले आये | वर्ष 1922 में जय प्रकाश नारायण आगे की शिक्षा ग्रहण करने के लिए अमेरिका चले गए |

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उच्च शिक्षा (Higher education)

जय प्रकाश नारायण ने कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय से रसायन इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की | इसके बाद इन्होंने शिकागो स्थित विसकौंसिन विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र का अध्ययन किया और बी0ए0 की डिग्री प्राप्त की | इसी विश्वविद्यालय में इन्हें समाजशास्त्र का प्राध्यापक नियुक्त कर लिया गया | इसके बाद उन्होंने एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की | एम०ए० के बाद इन्होंने पी०एच०डी करने के लिए विश्वविद्यालय में प्रवेश लेकर सामाजिक परिवर्तन’ (Social Change) नामक विषय पर अपना शोध आरम्भ किया, तभी उन्हें अपनी माता जी के बीमार होने का समाचार प्राप्त हुआ और वह अपना शोध छोड़कर भारत वापस आ गए |

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राजनैतिक जीवन (Political Life)

माता जी के देहांत के बाद उन्होंने राजनीति में सक्रिय भाग लेना आरम्भ किया | 1932 में असहयोग आन्दोलन के दौरान गिरफ्तार करके नासिक जेल में डाल दिया गया | जेल में ही यह राम मनोहर लोहिया, अशोक मेहता तथा मीनू मसानी से मिले | जेल से निकलने के बाद वह बम्बई चले गए वहां पर उन्होंने कांग्रेस के अंदर वर्ष 1934 में कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना की | जय प्रकाश नारायण ने वर्ष 1936 में ‘समाजवाद क्यों (Why Socialism) नामक पुस्तक की रचना की | इस पुस्तक के माध्यम से वह प्रसिद्ध हो गए |

जय प्रकाश नारायण एक समाजवादी, क्रान्तिकारी तथा राष्ट्रीय आन्दोलनकारी नेता थे | अंग्रेज सरकार ने ‘षड़यन्त्री नम्बर एक’ घोषित करके 18 अक्टूबर, 1941 को इन्हें हजारीबाग जेल में डाल दिया | वह जेल से भाग गए इसके बाद उन्होंने गांधी जी के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में सक्रिय भाग लिया | वर्ष 1943 में युवा समाजवादियों के द्वारा गोरिल्ला कार्यवाही से ब्रिटिश सम्पत्ति को हानि पहुंचाई |

गांधी जी उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया लेकिन पूर्ण बहुमत न मिलने के कारण वह कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं बन सके | गांधी जी की मृत्यु के पश्चात राष्ट्रीय कांग्रेस और कांग्रेस समाजवादी दल में आपसी मतभेदों के कारण कांग्रेस समाजवादी दल के सभी नेताओं को बहार निकाल दिया गया | वर्ष 1950 में जय प्रकाश नारायण ने ‘भारतीय समाजवादी दल’ की स्थापना की |

1952 में उन्होंने राजनीति छोड़कर बिनोबा जी के सर्वोदय तथा भू-दान आन्दोलन में भाग लिया और अपना सम्पूर्ण जीवन सर्वोदय समाज की स्थापना में लगाने की शपथ ली |

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आपातकाल का विरोध (Opposition To Emergency)

जय प्रकाश नारायण जी ने अपने जीवन के अन्तिम दशक में इंदिरा गाँधी की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध समग्र क्रान्ति (Total Revolution) का ऐलान कर दिया | 26 जून, 1975 को भारतीय राष्ट्रपति के द्वारा आपातकाल की घोषणा की गयी | इसके बाद जय प्रकाश नारायण जी को जेल में डाल दिया गया |

इन्हें हरियाणा राज्य में सोहना नामक स्थान पर नजरबंद रखा गया था पर स्वास्थ्य सही न होने के कारण इन्हें 12 नवम्बर, 1975 को जेल से रिहा कर दिया गया |

स्वास्थ्य सही होने पर जय प्रकाश नारायण ने वर्ष 1977 में ‘जनता पार्टी’ की स्थापना की | 1977 में ‘जनता पार्टी’ ने बहुमत को प्राप्त किया | तब से इन्हें लोकनायक के नाम से पुकारा जाने लगा | इन्होंने  मोरारजी देसाई जो कि जनता पार्टी के अध्यक्ष थे, उन्हें  प्रधानमंत्री पद पर सत्तारुढ़ किया,  लम्बी बीमारी के कारण 8 अक्टूबर, 1979 को 77 वर्ष की आयु में इनका निधन हो गया |

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राजनीतिक विचार (Political Views)

‘‘जब तक प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में राष्ट्रवाद की भावना का विकास नहीं होगा तब तक देश का सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता। भारत में सांस्कृतिक एकता होते हुए भी राजनीतिक एकता का अभाव है। भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा सम्पूर्ण भारतीय प्रदेश पर अधिकार करने के बाद ही एक सरकार के अन्तर्गत राष्ट्रीय एकता का उदय हुआ है।’’

“राष्ट्रीय एकता के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति धार्मिक अन्धविश्वासों से बाहर निकलकर अपने अन्दर एक बौद्धिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करें।’’

“राजनीतिक दलीय प्रणाली में जनता की स्थिति उन भेड़ों की तरह होती है जो निश्चित अवधि के पश्चात् अपने लिए ग्वाला चुन लेती है। ऐसी लोकतन्त्रीय शासन प्रणाली में मैं उस स्वतन्त्रता के दर्शन कर नहीं पाता जिसके लिए मैंने तथा जनता ने संघर्ष किया था।’’

“मुझे न तो पहले विश्वास था और न अब है कि राज्य पूर्ण रूप से कभी लुप्त हो जाएगा। परन्तु मुझे यह विश्वास है कि राज्य के कार्यक्षेत्र को जहां तक सम्भव हो घटाने के प्रयास करना सबसे अच्छा उद्देश्य है” |

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