जानिये क्या है भारत के नागरिक के मौलिक अधिकार !

भारतीय नागरिक के मौलिक अधिकार !

व्यक्ति के समुचित विकास के लिए संविधान के द्वारा कुछ विशेष अधिकार दिए गए, जिनका पालन करना राज्य सरकार को अनिवार्य है, इन्हीं अधिकारों को मौलिक अधिकार कहा जाता है, व्यक्ति के विकास में राज्य की भूमिका विशेष हैं | राज्य किसी भी व्यक्ति के विकास में सहयोग करता है या फिर असहयोग करता है, यह राजा या राज्य के ऊपर निर्भर करता था, राज्य या राजा किसी व्यक्ति पर निरंकुश शासन न करे इसी बात को गहनता से समझते हुए हमारे देश के सविंधान निर्माताओं नें सविंधान में मौलिक अधिकार को जोड़ा और इसे राज्य द्वारा निर्मित कानूनों से ऊपर रखा, जानिये क्या है, भारत के नागरिक के मौलिक अधिकार ! इसके बारें में आपको इस पेज पर विस्तार से बता रहे है |

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मौलिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्‍य

  • इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया हैं
  • इसका वर्णन संविधान के भाग-3 में (अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35) है
  • इसमें संशोधन हो सकता है और राष्ट्रीय आपात के दौरान (अनुच्छेद 352) जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को छोड़कर अन्य मौलिक अधिकारों को स्थगित किया जा सकता है
  • मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, लेकिन 44वें संविधान संशोधन (1979 ई०) के द्वारा संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31 से अनुच्छेद 19f) को मौलिक अधिकार की सूची से हटाकर, इसे संविधान के अनुच्छेद 300 (a) के अन्तगर्त क़ानूनी अधिकार के रूप में रखा गया है

भारतीय नागरिकों को प्राप्त मूल अधिकार  

  • समता या समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18)
  • स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)
  • संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30)
  • संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 32)

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1.समता या समानता का अधिकार

अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता |

अनुच्छेद 15: धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेद-भाव का निषेध |

अनुच्छेद 16: लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता | अपवाद- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग |

अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का अंत- अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए इससे दंडनीय अपराध घोषित किया गया है |

अनुच्छेद 18: उपाधियों का अंत |

2.स्वतंत्रता का अधिकार

अनुच्छेद 19- मूल संविधान में 7 तरह की स्वतंत्रता का उल्लेख था, अब सिर्फ 6 हैं |

  • 19 (a) बोलने की स्वतंत्रता
  • 19 (b) शांतिपूर्वक बिना हथियारों के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता
  • 19 (c) संघ बनाने की स्वतंत्रता
  • 19 (d) देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन की स्वतंत्रता
  • 19 (e) देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता (अपवाद जम्मू-कश्मीर)
  • 19 (f) संपत्ति का अधिकार
  • 19 (g) कोई भी व्यापार एवं जीविका चलाने की स्वतंत्रता

नोट: प्रेस की स्वतंत्रता का वर्णन अनुच्छेद 19 (a) में दिया गया  है |

अनुच्छेद 20- अपराधों के लिए दोष-सिद्धि के संबंध में संरक्षण |

अनुच्छेद 21- प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का सरंक्षण |

अनुच्छेद 21(क) राज्य 6 से 14 वर्ष के आयु के समस्त बच्चों को ऐसे ढंग से जैसा कि राज्य, विधि द्वारा निर्धारित करें, निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगा. ( 86वां संशोधन 2002 के द्वारा) |

अनुच्छेद 22- कुछ दशाओं में गिरफ़्तारी और निरोध में संरक्षण  |

3.शोषण के विरुद्ध अधिकार

अनुच्छेद 23: मानव तश्करी और बल पूर्वक श्रम का प्रतिषेध |

नोट: जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय सेवा करने के लिए बाध्य किया जा सकता है |

अनुच्छेद 24: बालकों के नियोजन का प्रतिषेध 14 वर्ष से कम आयु वाले किसी बच्चे को कारखानों, खानों या अन्य किसी जोखिम भरे काम पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है |

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4.धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

अनुच्छेद 25: अंत:करण की और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता |

अनुच्छेद 26: धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता |

अनुच्छेद 27: राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसे कर देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है, जिसकी आय किसी विशेष धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या पोषण में व्यय करने के लिए विशेष रूप से निश्चित कर दी गई है |

अनुच्छेद 28: राज्य विधि से पूर्णतः पोषित किसी शिक्षा संस्था में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी |

5.संस्कृति एवं शिक्षा संबंधित अधिकार

अनुच्छेद 29: अल्पसंख्यक हितों का संरक्षण कोई अल्पसंख्यक वर्ग अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रख सकता है और केवल भाषा, जाति, धर्म और संस्कृति के आधार पर उसे किसी भी सरकारी शैक्षिक संस्था में प्रवेश से नहीं रोका जाएगा |

अनुच्छेद 30: शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार |

6.संवैधानिक उपचारों का अधिकार

‘संवैधानिक उपचारों का अधिकार’ को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा है |

अनुच्छेद 32: इसके अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को पांच तरह के रिट निकालने की शक्ति प्रदान की गई है जो इस प्रकार  हैं |

  •  बंदी प्रत्यक्षीकरण
  •  परमादेश
  •  प्रतिषेध लेख
  •  उत्प्रेषण
  •  अधिकार पृच्छा लेख

बंदी प्रत्यक्षीकरण

इसके द्वारा न्यायालय बंदीकरण करने वाले अधिकारी को आदेश देता है कि वह बंदी बनाए गए व्यक्ति को निश्चित स्थान और निश्चित समय के अंदर उपस्थित करे, जिससे न्यायालय बंदी बनाए जाने के कारणों पर विचार कर सके |

परमादेश

इस प्रकार के आज्ञापत्र के आधार पर पदाधिकारी को उसके कर्तव्य का पालन करने का आदेश जारी किया जाता है |

प्रतिषेध लेख

इसके दवरा अधीनस्थ न्यायालयों को यह निर्देश दिया जाता है कि वे अपने पास लंबित मुकदमों के न्याय निर्णयन के लिए उससे वरिष्ठ न्यायालय को भेजें |

उत्प्रेषण

यह सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय द्वारा निम्न न्यायालयों तथा अर्द्ध न्यायिक न्यायाधिकरणों को जारी किया जाता है और उनको यह आदेश दिया जाता है, कि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है |

अधिकार पृच्छा लेख

जब कोई व्यक्ति ऐसे पदाधिकारी के रूप में कार्य करने लगता है, जिसके रूप में कार्य करने का उसको वैधानिक रूप से अधिकार नहीं है, न्यायालय अधिकार-पृच्छा के आदेश के द्वारा उस व्यक्ति से पूछता है, कि वह किस अधिकार से कार्य कर रहा है और जब तक वह इस बात का संतोषजनक उत्तर नहीं देता वह कार्य नहीं कर सकता है |

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