आधार वर्ष (Base Year) क्या होता है?

आधार वर्ष से सम्बंधित जानकारी (About Base Year)

सकल घरेलू उत्पाद अर्थात जीडीपी निर्धारित करने के लिए आधार वर्ष तय किए जाते हैं, अर्थात उस आधार वर्ष में देश का जो कुल उत्पादन था,  उसकी अपेक्षा में अर्थव्यवस्था में कितनी कमी हुई है या वृद्धि हुई है, उसे ही जीडीपी दर माना जाता है। सरकार समय-समय पर आधार वर्ष में संशोधन करती रहती है, यह बदलाव इसलिए किये जाते है, ताकि अर्थव्यवस्था के बारे में आंकड़ों का दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं से सामंजस्य रखा जा सके। इसे अर्थशास्त्री भी जरूरी मानते हैं। ऐसा माना जाता है, अर्थव्यवस्था के सही आकलन के लिए हर पांच साल पर बेस ईयर बदल देना चाहिए। वर्ष 2015 में सरकार ने जीडीपी सीरीज का बेस ईयर 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया था।

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आधार वर्ष क्या होता है (What Is Base Year)

आधार वर्ष एक प्रकार का बेंचमार्क होता है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय आँकड़े जैसे- जीडीपी, सकल घरेलू बचत और सकल पूंजी निर्माण आदि की गणना की जाती है। सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी का आशय किसी देश में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य से होता है। जीडीपी मुख्यतः 2 प्रकार की होती है, नॉमिनल जीडीपी और  वास्तविक जीडीपी ।

  • नॉमिनल जीडीपी- यह चालू कीमतों (वर्तमान वर्ष की प्रचलित कीमत) में व्यक्त सभी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को मापता है।
  • वास्तविक जीडीपी- नॉमिनल जीडीपी के विपरीत यह किसी आधार वर्ष की कीमतों पर व्यक्त की गई सभी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को बताता है।

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आधार वर्ष की कीमतें स्थिर मानी जाती हैं, जबकि चालू वर्ष की कीमतों में परिवर्तन संभव होता है। सामान्यतः आधार वर्ष एक प्रतिनिधि वर्ष होता है और उसके चुनाव के समय ध्यान रखा जाता है कि उस वर्ष में कोई बड़ी आर्थिक व प्राकृतिक घटना, जैसे- बाढ़, सूखा या भूकंप आदि न घटित हुई हो। आधार वर्ष का चुनाव करते समय यह भी ध्यान रखा जाता है वह चालू वर्ष के निकट ही हो, ताकि अर्थव्यवस्था की सही स्थिति का आकलन किया जा सके। गौरतलब है कि इस आवश्यकता का ध्यान रखते हुए देश में प्रत्येक 7 से 10 वर्षों में आधार वर्ष को बदला जाता है।आधार वर्ष में परिवर्तन से देश के जीडीपी के आकार में भी वृद्धि होती है।

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आधार वर्ष में परिवर्तन की आवश्यकता (Change In Base Year Required)

सभी देशों की अर्थव्यवस्था में समय के अनुसार बदलाव होते रहते हैं, और इस प्रकार होनें वाले परिवर्तनों का देश के विकास पर प्रभाव पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अर्थव्यवस्था के अन्दर होने वाले इन्हीं संरचनात्मक परिवर्तनों (जैसे- जीडीपी में सेवाओं की बढ़ती हिस्सेदारी) को प्रतिबिंबित करने के लिये आकलन के आधार वर्ष को समय-समय पर संशोधित करने की आवश्यकता होती है। इसके अलावा जीडीपी की गणना के लिये आधार वर्ष में बदलाव का एक अन्य उद्देश्य वर्तमान परिस्थिति के अनुकूल सटीक आर्थिक आँकड़े एकत्रित करना भी होता है, क्योंकि सटीक आँकड़ों के अभाव में अर्थव्यवस्था के अंतर्गत कल्याणकारी योजनाओं का निर्माण संभव नहीं हो पाता है।

वर्ष 2011-12 पर आधारित सकल घरेलू उत्पाद अर्थात जीडीपी इस समय की आर्थिक स्थिति को सही ढंग से प्रदर्शित नहीं करती है| वहीं नए आधार वर्ष की शृंखला के संबंध में जानकारों का मानना है, कि यह संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्रीय खाते के दिशा-निर्देशों-2018 के अनुरूप होगी। दुनिया के विभिन्न देश आधार वर्ष को संशोधित करने हेतु अलग-अलग मानकों का प्रयोग करते हैं।

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GDP, CPI & IIP का आधार वर्ष

सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product)

सकल घरेलू उत्पाद अर्थात जीडीपी किसी भी देश की आर्थिक स्थिति को मापने का सबसे बेहतर पैमाना है| सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MOSPI) जीडीपी के लिए 2017-18 को नया आधार वर्ष बनाने पर विचार कर रहा है| वर्तमान में जीडीपी का बेस ईयर 2011-12 है| इस साल अप्रैल-जून तिमाही में देश के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्ध‍ि दर घटकर 5 फीसदी रह गई है| यह लगभग 7 वर्षों में भारत के विकास दर की यह सबसे कम रफ्तार है| अहम बात यह है, कि जीडीपी के मामले में हम बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे हो गए हैं,  पिछले पांच साल (2014-15 से 2018-19) में भारत की औसत जीडीपी बढ़त दर 7.6 फीसदी ही रही है|

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उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index )

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक घरेलू उपभोक्ताओं द्वारा खरीदे गये सामानों एवं सेवाओं के औसत मूल्य को मापने वाला एक सूचकांक है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की गणना वस्तुओं एवं सेवाओं के एक मानक समूह के औसत मूल्य की गणना करके की जाती है। वर्ष 2011 में इसके तीन भागो में विभाजित कर दिया गया, शहरी+ग्रामीण+(शहरी+ग्रामीण) | जनवरी 2015 को इसके औसत वर्ष को बदलकर 2010 से 2012 कर दिया गया| शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए इसके आंकड़े मासिक और वार्षिक निकाले जाते हैं| वार्षिक आँकड़े जब निकाले जाते हैं, तो चार्ट में एक महीने पीछे के CPI आँकड़े दिए रहते हैं (फरवरी को जनवरी का, मार्च में फरवरी का)|

अन्य सूचकांक की भांति उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को औसत वर्ष और वर्तमान वर्ष से कैलकुलेट करते हैं| औसत वर्ष में पहले का मूल्य क्या था और अब क्या है ? सीपीआई इसी की तुलना कर के महंगाई दर को प्रतिशत दर में प्रदर्शित करता है|

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औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (Index of Industrial Production)

केंद्रीय सांख्यिकी संगठन अर्थात सीएसओ,”सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय” के अंतर्गत एक विभाग है जो 1950 से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) से सम्बंधित आंकड़े एकत्र और प्रकाशित करता है| औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) देश के 8 कोर सेक्टर्स में एक माह में उत्पादन के दौरान होनें वाले उतार चढ़ाव को मापता है| मई 2017 से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) का आधार वर्ष 2011-12 है|

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औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के अंतर्गत इन 8 क्षेत्रों के आंकड़ों का मापन किया जाता है, जो इस प्रकार है –

क्र०सं० वस्तु का नाम कुल भार
1.कोयला10.33%
2कच्चा तेल8.98%
3.प्राकृतिक गैस6.88%
4.रिफाइनरी उत्पाद28.04%
5.स्टील17.92%
6.सीमेंट5.37%
7.उर्वरक2.63%
8.बिजली19.85%

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